नमस्ते दोस्तों ! आज हम मनुष्य शरीर में मौजूद एक ऐसी अदृश्य शक्ति के बारे में बात करेंगे, जिसे जानकर आप अपना आध्यात्मिक कल्याण कर सकते हैं। पौराणिक कथाओं में कहा जाता है कि ऋषि-मुनि इतने संयमी, धैर्यवान और सर्वज्ञानी हुआ करते थे कि उनके जीवन में सुख-दुःख, मान-अपमान जैसी परिस्थितियाँ कोई मायने नहीं रखती थी। वे हर स्थिति को शांत भाव से स्वीकार कर लेते थे। उनकी यह स्थिति इतनी गहन होती थी कि उनके द्वारा कोई भी दिया गया आशीर्वाद या श्राप सच हो जाता था।
लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसके पीछे का कारण क्या था? इस रहस्य का उत्तर छिपा है उनके 7 चक्रो के जागरण में। मनुष्य शरीर में 7 प्रमुख ऊर्जा केंद्र होते हैं जिन्हें चक्र कहा जाता है। जब यह चक्र जागृत होता है तो इंसान की चेतना ऊंचे स्तर पर पहुंच जाती है और वह असाधारण ज्ञान, शांति और शक्ति का अनुभव करता है। इसलिए आज हम समझेंगे :
7 चक्र क्या है?
7 चक्र कैसे जाग्रत करें?
इनके जागरण से हमारे जीवन में क्या परिवर्तन आता है ? तो आइए, इस रहस्यमय यात्रा की शुरुआत करते हैं और जानते हैं कि 7 चक्र कैसे जागृत करें।

चक्र क्या है?
संस्कृत में चक्र का अर्थ है ‘पहिया’ या ‘वृत’। मनुष्य के शरीर में चक्र एक अदृश्य ऊर्जा केंद्र होते हैं, जो गोलाकार आकार में स्थित रहते हैं। यह हमारे भीतर ऊर्जा के स्रोत और प्रवाह के मार्ग के रूप में कार्य करते हैं।
यद्यपि शरीर में अनेक चक्र पाए जाते हैं, परंतु सात चक्र अत्यंत महत्वपूर्ण माने गए हैं। इन सातों चक्रों का गहरा आध्यात्मिक, मानसिक और शारीरिक महत्व है। यदि कोई साधक अपने भीतर इन चक्रों को जागृत कर लेता है, तो वह सामान्य मनुष्य न रहकर एक विशेष और जाग्रत व्यक्तित्व बन जाता है। उसके भीतर ज्ञान, शक्ति और क्षमता की प्रचुरता आ जाती है।
इन 7 चक्रों के सक्रिय होने से जीवन के हर क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन आते हैं। यह न केवल शरीर को स्वस्थ और ऊर्जावान बनाते हैं, बल्कि मानसिक संतुलन और आध्यात्मिक उन्नति में भी सहयोग करते हैं। इस प्रकार चक्र मनुष्य के कल्याण की कुंजी माने जाते हैं।
योग शास्त्र में 7 चक्र बताए गए हैं जो इस प्रकार है-
7 chakras names
1. मूलाधार चक्र-
मूलाधार चक्र हमारी रीड की हड्डी के सबसे निचले हिस्से में, गुदा और जननेंद्रिय के बीच स्थित होता है। इसे शरीर का प्रथम ऊर्जा स्रोत और आधार चक्र माना जाता है। कहा जाता है कि लगभग 99.9% लोगों की चेतना इसी चक्र पर अटकी रहती है। यह चक्र मुख्यतः नींद, भोजन और मूलभूत आवश्यकताओं से जुड़ा होता है।
लेकिन यदि कोई साधक सही साधना के माध्यम से इस चक्र को जागृत कर लें, तो वह इन भौतिक बंधनों से ऊपर उठकर आंतरिक स्वतंत्रता और शक्ति का अनुभव कर सकता है।

2. स्वाधिष्ठान चक्र-
स्वाधिष्ठान चक्र जननेंद्रियों से लगभग चार अंगुल ऊपर स्थित होता है। यह हमारे जीवन में आनंद, रचनात्मकता और भौतिक सुखों का केंद्र माना जाता है। यदि आपकी ऊर्जा इस चक्र में निष्क्रिय है, तो जीवन में मौज-मस्ती और मनोरंजन को ही अधिक महत्व मिलेगा।
आप हर समय भौतिक सुखों का आनंद लेने और हर चीज का लुफ्त उठाने की चाह में रहेंगे। हालांकि मनोरंजन जीवन के लिए आवश्यक है, लेकिन इसकी आदत चेतना को बाँध देती है। आवश्यकता से अधिक मनोरंजन व्यक्ति के आंतरिक ऊर्जा और आत्मिक विकास में बाधा बन सकता है।
3. मणिपुरक चक्र-
मणिपुरक चक्र नाभि के मूल में स्थित होता है और यह शरीर का तीसरा प्रमुख ऊर्जा केंद्र है। इसे ऊर्जा का संगम स्थल भी कहा गया है, क्योंकि यहा अनेक नाड़ियाँ आकर मिलती है और फिर विभिन्न दिशाओं में प्रवाहित होती है।
जिस व्यक्ति की चेतना या ऊर्जा इस चक्र में केंद्रित हो जाती है, उसमें कार्य करने की अद्भुत लगन और जोश उत्पन्न होता है। ऐसे लोग कर्म योगी कहलाते हैं, जो बिना थके हर प्रकार के कार्य के लिए तत्पर रहते हैं। उनके ऊर्जा उन्हें निरंतर सक्रिय और कर्मशील बनाए रखती है।
4. अनाहत चक्र-
अनाहत चक्र हृदय स्थल में, हमारे स्तनों के बीच स्थित होता है। यह शरीर का चौथा प्रमुख ऊर्जा केंद्र है। यदि आपकी ऊर्जा अनाहत चक्र में सक्रिय है, तो आप स्वभाव से सृजनशील और रचनात्मक होंगे। आपका मन हमेशा कुछ नया सोचने, नया बनाने और रचनात्मक कार्यों में लगा रहेगा। यह चक्र प्रेम, करुणा और रचनात्मकता का प्रतीक है, जो व्यक्ति को उच्चतर चेतना और गहरी संवेदनशीलता से जोड़ता है।

5. विशुद्ध चक्र-
विशुद्ध चक्र हमारे शरीर में गले के ऊपरी भाग, स्वर यंत्र के केंद्र में स्थित होता है। इसे कंठ चक्र भी कहा जाता है। योग शास्त्र में कंठ को माँ सरस्वती का स्थान माना गया है, और यही वह स्थान है जहाँ विशुद्ध चक्र स्थित होता है।
यदि आपकी ऊर्जा इस चक्र में सक्रिय हो जाती है, तो आपकी वाणी प्रभावशाली और सत्य निष्ठ हो जाती है। आपके शब्दों में आकर्षण और शक्ति आ जाती है। यह चक्र व्यक्ति को अति शक्तिशाली बनाता है, क्योंकि इसके माध्यम से विचार, भावनाएं और ज्ञान स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त होते हैं।
6. आज्ञा चक्र-
आज्ञा चक्र हमारी दोनों भौंहो के बीच, ललाट के मध्य भाग में स्थित होता है। इसे तीसरा नेत्र या भूमध्य चक्र भी कहा जाता है। यह चक्र अंतर्ज्ञान, विचारों की स्पष्टता और आत्मबोध का केंद्र माना जाता है।
यदि आपकी ऊर्जा आज्ञा चक्र में सक्रिय हो जाती है या इस स्तर तक पहुंच जाती है, तो इसका अर्थ है कि आपने भौतिक स्तर पर एक विशेष सिद्धि प्राप्त कर ली है। ऐसी सिद्धि मन को गहरी शांति और स्थिरता प्रदान करती है।
यह चक्र जागृत होने पर व्यक्ति की अंतर्दृष्टि प्रखर हो जाती है, निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है और अदृश्य या सूक्ष्म बातों को समझने की योग्यता विकसित होती है। आज्ञा चक्र ही वह द्वार है जो साधक को उच्चतर चेतना और आध्यात्मिक मार्ग की ओर ले जाता है।
7. सहस्त्रार चक्र-
सहस्त्रार चक्र हमारे सिर के शीर्ष भाग पर, जहाँ चोटी होती है वहीं स्थित होता है। यह शरीर का सातवां और सर्वोच्च ऊर्जा केंद्र है। इस चक्र का स्थान सिर के बिल्कुल मध्य शीर्ष पर माना जाता है। यही वह द्वार है, जिसके माध्यम से साधक ब्रह्मांडीय ऊर्जा और परम चेतना से जुड़ता है। जब सहस्रार चक्र सक्रिय हो जाता है, तो व्यक्ति आत्मज्ञान, आध्यात्मिक प्रकाश और गहरी शांति का अनुभव करता है। यह चक्र मानव चेतना को भौतिक सीमाओं से ऊपर उठकर दिव्य अनुभूति तक ले जाता है।
7 चक्र कैसे जागृत करें- How to activate 7 chakras in human body
मूलाधार चक्र-
मूलाधार चक्र को जागृत करने के लिए सबसे पहले भोग, संभोग और निद्रा पर संयम रखना आवश्यक है। नियमों का पालन करते हुए जीवन में साक्षी भाव अपनाना इस चक्र की साधना का मूल आधार है।
इस चक्र को सक्रिय करने के लिए कुछ योगासन अत्यंत लाभकारी माने गए हैं, जैसे-
ताड़ासन
वीरभद्रासन
वज्रासन
मलासन
इसके साथ ही प्राणायाम जैसे कपालभाति और भस्त्रिका का अभ्यास करने से भी मूलाधार चक्र की ऊर्जा जागृत होने लगती है।
इस चक्र का बीज मंत्र “लं” है। इसका उच्चारण करते समय आपको अपना ध्यान मूलाधार चक्र पर केंद्रित करना चाहिए। ऐसा करने से इस ऊर्जा केंद्र का कंपन बढ़ता है और यह धीरे-धीरे सक्रिय व संतुलित हो जाता है।
स्वाधिष्ठान चक्र-
स्वाधिष्ठान चक्र को जागृत करने के लिए सबसे पहले असत्य, अहंकार, आलस्य और अन्य नकारात्मक प्रवृत्तियों का नाश करना आवश्यक है। इन दोषों को दूर करने से चक्र की ऊर्जा सहज रूप से प्रवाहित होने लगती है।
इस चक्र को सक्रिय करने के लिए कुछ योगासन-
बुद्धकोणासन
उत्तानासन
पश्चिमोत्तानासन
साथ ही प्राणायाम जैसे अनुलोम-विलोम और भ्रामरी प्राणायाम का नियमित अभ्यास इस चक्र की ऊर्जा को जागृत करता है।
स्वााधिष्ठान चक्र का बीज मंत्र “वं” है इसका उच्चारण करते समय ध्यान स्वाधिष्ठन चक्र पर केंद्रित करना चाहिए। ऐसा करने से यह ऊर्जा केंद्र धीरे-धीरे सक्रिय और संतुलित हो जाता है।
मणिपुरक चक्र-
मणिपुरक चक्र को जागृत करने के लिए कुछ विशेष योगासन और प्राणायाम का अभ्यास अत्यंत लाभकारी माना गया है। योगासन में शामिल है-
त्रिकोणासन
धनुरासन
साथ ही प्राणायाम में उज्जायी प्राणायाम, कपालभाति प्राणायाम।
इस चक्र का बीज मंत्र “रं” है इसका उच्चारण करते समय ध्यान मणिपुरक चक्र पर केंद्रित करना चाहिए। नियमित अभ्यास से यह ऊर्जा केंद्र सक्रिय और संतुलित होता है, जिससे व्यक्ति में शक्ति, आत्मविश्वास और कर्मशीलता बढ़ती है।
अनाहत चक्र-
अनाहत चक्र को जागृत करने के लिए कुछ विशेष योगासन और प्राणायाम
योगासन में शामिल है-
भुजंगासन
उष्ट्रासन
गोमुखासन
धनुरासन
साथ ही प्राणायाम में उज्जायी, प्राणायाम, भस्त्रिका प्राणायाम, अनुलोम-विलोम।
इस चक्र का बीज मंत्र “यं” है इसका उच्चारण करते समय ध्यान अनाहत चक्र पर केंद्रित करना चाहिए। नियमित अभ्यास से ऊर्जा केंद्र सक्रिय और संतुलित होता है, जिससे प्रेम, करुणा और रचनात्मकता में वृद्धि होती है।
विशुद्ध चक्र-
विशुद्ध चक्र को जागृत करने के लिए कुछ विशेष योगासन और प्राणायाम
योगासन में शामिल है-
सर्वांगासन
मत्स्यासन
सिंहासन
साथ ही प्राणायाम में उज्जायी प्राणायाम, भ्रामरी प्राणायाम।
इस चक्र का बीज मंत्र “हं” है। इसका उच्चारण करते समय ध्यान विशुुद्ध चक्र पर केंद्रित करना चाहिए। नियमित अभ्यास से यह ऊर्जा केंद्र सक्रिय और संतुलित होता है, जिससे संचार शक्ति, आत्मविश्वास और ज्ञान में वृद्धि होती है।
आज्ञा चक्र-
आज्ञा चक्र को जागृत करने के लिए कुछ विशेष योगासन और प्राणायाम
योगासन में शामिल है-
बलासन
पश्चिमोत्तानासन
शीर्षासन
प्राणायाम में भ्रामरी प्राणायाम, अनुलोम-विलोम प्राणायाम, नाड़ी शोधन प्राणायाम।
इस चक्र का बीज मंत्र “ओम” है। इसका उच्चारण करते समय ध्यान आज्ञा चक्र पर केंद्रित करना चाहिए। नियमित अभ्यास से ऊर्जा केंद्र सक्रिय और संतुलित होता है, जिससे अंतर्ज्ञान, मानसिक स्पष्टता और आध्यात्मिक जागरूकता में वृद्धि होती है।

सहस्त्रार चक्र-
सहस्त्रार चक्र को जागृत करने के लिए कुछ विशेष योगासन और प्राणायाम इस प्रकार है
योगासन में शामिल है –
शीर्षासन
श्वासन
पद्मासन
प्राणायाम में उज्जायी प्राणायाम, नाड़ी-शोधन प्राणायाम, भ्रामरी प्राणायाम।
इस चक्र का बीज मंत्र “ओम” है इसका उच्चारण करते समय ध्यान सहस्रार चक्र पर केंद्रित करना चाहिए। नियमित अभ्यास से यह ऊर्जा केंद्र सक्रिय और संतुलित होता है, जिससे व्यक्ति में उच्चतम चेतना, आध्यात्मिक प्रकाश और गहरी शांति का अनुभव होता है।
7 चक्रो का बीज मंत्र क्या है और रंग?
मूलाधार – लाल- लं
स्वााधिष्ठान – नारंगी – वं
मणिपुरक – पीला – रं
अनाहत – हरा – यं
विशुद्ध – नीला – हं
आज्ञा – गहरा नीला – ओम
सहस्रार – बैंगनी /सफेद – ओम
सात चक्र के जागृत होने के लाभ- 7 chakras benefits in hindi
जब आपके सातों चक्र जागृत हो जाते हैं, तो आपके भीतर के लालच, मोह, क्रोध, घृणा जैसी नकारात्मक प्रवृत्तिया समाप्त होने लगती है। आपकी चेतना में सकारात्मकता, रचनात्मकता और ज्ञान का उदय होता है। इसका परिणाम यह होता है कि आप महान कवि, लेखक या कहानीकार बन सकते हैं। सातों चक्रों के सक्रिय होने से आपके भीतर 16 कलाओं और 16 विभूतियों का ज्ञान उत्पन्न होता है।
साथ ही आप भौतिक सिद्धि और आंतरिक शांति प्राप्त करते हैं। आपकी चेतना उच्चतर स्तर पर पहुंचती है, और आप भौतिक जीवन के साथ-साथ आध्यात्मिक उन्नति और मोक्ष की और भी अग्रसर होते हैं।
इस प्रकार सातों चक्रो का जागृत होना व्यक्ति को सर्वज्ञानी और पूर्णतया संतुलित व्यक्तित्व प्रदान करता है।
निष्कर्ष-
सातों चक्रों को जागृत करना हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इनके सक्रिय होने से शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक विकास संभव होता है, लेकिन यह प्रक्रिया कठिन और संवेदनशील भी है।
आप इन चक्रों को स्वयं अभ्यास के माध्यम से जागृत कर सकते हैं, लेकिन सही मार्गदर्शन में अभ्यास करना अधिक सुरक्षित और प्रभावशाली होता है। किसी योग गुरु या अनुभवी शिक्षक के मार्गदर्शन में ही चक्र का अभ्यास करें।
यदि इन 7 चक्रो को गलत तरीके से जागृत किया जाए, तो यह हमारे शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है और अवांछित परिणाम उत्पन्न कर सकता है।
इसलिए यह ध्यान रखें कि 7 चक्र कैसे जागृत करें इसका अभ्यास हमेशा सावधानी पूर्वक, अनुशासित और योग्य गुरु की देखरेख में ही किया जाना चाहिए। सही साधना और मार्गदर्शन से ही आप इन चक्रों की शक्तियों का सुरक्षित और पूर्ण लाभ प्राप्त कर सकते हैं।
FAQ:
प्रश्न 1. सबसे पहले कौन सा चक्र जागृत होता है?
उत्तर. सबसे पहले मूलाधार चक्र जागृत होता है।
प्रश्न 2. सबसे शक्तिशाली चक्र कौन सा है?
उत्तर. सहस्त्रार चक्र सबसे शक्तिशाली है, यह हमें ब्रह्मांडीय ऊर्जा से जोड़ता है।
प्रश्न 3. सबसे पहले कौन सा चक्र जागृत करना चाहिए?
उत्तर. योग शास्त्र के अनुसार सबसे पहले मूलाधार चक्र को जागृत करना महत्वपूर्ण माना जाता है।
प्रश्न 4. मूलाधार चक्र किसका प्रतीक है?
उत्तर. मूलाधार चक्र आंतरिक शक्ति का प्रतीक है।
हमें विश्वास है कि इस आर्टिकल के माध्यम से आपको 7 चक्र कैसे जागृत करें को जानने में सुविधा मिली होगी, धन्यवाद।