हमारे भारत में बच्चों की परवरिश को लेकर एक बहुत बड़ी समस्या देखने को मिलती है। अक्सर माँ-बाप अपने बच्चों की तुलना दूसरे बच्चों से करने लगते हैं –
“शर्मा जी के बेटे को देखो? वो कितना आगे निकल गया है।”
“फला का बच्चा तो कितना होशियार है, तुम्हें तो कुछ नहीं आता।”
कई बार तो मेहमानों के सामने ही बच्चों को डांट दिया जाता है, उनकी कमियों को सबके सामने उजागर किया जाता है और ऐसे वाक्य कह दिए जाते है –
“इससे तो कुछ नहीं होगा।”
“हमारा नाम खराब कर देगा।”
यही से सवाल उठता है कि असल में पेरेंटिंग क्या है? क्या बच्चों को बार-बार दूसरों से तुलना करके नीचा दिखाना सही परवरिश है, या फिर उन्हें समझना, उनका आत्मविश्वास बढाना और हर हाल में उनके साथ खड़े रहना सही तरीका है?
आज के इस आर्टिकल में हम इन्हीं बातों को समझेंगे और जानेंगे कि पॉजिटिव पेरेेंटिंग कैसे बच्चों की ज़िंदगी बदल सकती है।

पेरेंटिंग क्या है।what is parenting meaning
पेरेंटिंग का हिंदी में अर्थ होता है परवरिश। पेरेंटिंग एक ऐसी प्रक्रिया है जिसके ज़रिये माता-पिता अपने बच्चों को समझाते हैं, गाइड करते हैं और जीवन के लिए तैयार करते हैं। बच्चों का व्यवहार काफी हद तक इसी बात को दिखाता है कि उन्हें घर में कैसी परवरिश मिली है।
बच्चा जिद्दी है या समझदार, दूसरों से बात करने का तरीका कैसा है, मेहमानों से कैसे पेश आता हैं, अपने फेसले खुद ले पाता हैं या नहीं, उसके दोस्त कैसे हैं, वह बड़ों का सम्मान करता है या नहीं – यह सारी बातें बच्चों के व्यवहार से जुड़ी होती है।
इन सभी बातों से यह समझ में आता है कि माँ-बाप अपने बच्चों की पेरेंटिंग कैसे करते हैं और वे अपने बच्चों की परवरिश सही तरीके से कर रहे हैं या नहीं।
पेरेंटिंग स्टाइल इन हिंदी। what is parenting style in hindi
1. Authoritarian style
Authoritarian parenting एक ऐसी parenting style है जिसमें माता-पिता बहुत ज़्यादा सख़्त होते हैं। वे बच्चों की छोटी-छोटी गलतियों पर डांटते हैं, चिल्लाते हैं और उनसे कठोर व्यवहार करते हैं। इस स्टाइल में माता-पिता द्वारा बनाए गए नियम बच्चों को बिना सवाल किए मानने पड़ते हैं, चाहे बच्चे का मन हो या ना हो, या फिर नियम सही हो या गलत।
इस तरह की पेरेंटिंग में बच्चों की राय और भावनाओं को ज्यादा महत्व नहीं दिया जाता। माता-पिता अपनी बात बच्चों पर थोप देते हैं – “मैं जैसा कहूँ, वैसा ही करो।” कई बार बच्चों के खाने-पीने, सोने-जागने के समय से लेकर उनके भविष्य के फैसले तक सब कुछ माता-पिता ही तय करते हैं। बच्चों को अपनी पसंद, रुचि और फैसले रखने की आजादी नहीं मिलती।
2. Authoritative parenting style
Authoritative parenting एक संतुलित पेरेंटिंग स्टाइल है। इसमें माता-पिता बहुत ज्यादा सख़्त नहीं होते, बल्कि बच्चों के साथ पॉजिटिव और भरोसे वाला रिश्ता बनाते हैं। वे नियम बनाते हैं, लेकिन बच्चों को यह भी समझाते हैं कि उन नियमों को क्यों मानना जरूरी है। छोटी-छोटी बातों पर चिल्लाने या डाटने की बजाय वे बच्चों से प्यार और समझदारी से बात करते हैं।
इस स्टाइल में बच्चों की राय को महत्व दिया जाता है। अगर बच्चा किसी नियम को फॉलो नहीं कर रहा होता, तो उसे डांटने से पहले उससे वजह पूछी जाती है। माता-पिता बच्चों की बात सुनते हैं, उन्हें अपनी पसंद और भविष्य को लेकर सोचने की आजादी देते हैं और मानसिक रूप से आगे बढ़ने के लिए तैयार करते है।
3. Permissive parenting style
Permissive parenting में माता-पिता बच्चों को बहुत ज्यादा आजादी दे देते हैं। इस स्टाइल में बच्चों की हर बात मान ली जाती है और उन्हें रोकने-टोकने या नियम समझाने की ज्यादा कोशिश नहीं की जाती। घर में क्या करना है, क्या खाना है, कहाँ जाना है या कैसे रहना है – ज्यादातर फैसले बच्चों पर ही छोड़ दिए जाते हैं।
इस तरह की पेरेंटिंग में माता-पिता बच्चों को डांटते नहीं है और छोटी-छोटी गलतियों पर भी उन्हें समझाने या सीमाएं तय करने से बचते हैं। बच्चे मोबाइल या टीवी ज्यादा देखे तो भी उन्हें समय पर रोकना नहीं है। माता-पिता बच्चों के साथ दोस्ताना रिश्ता तो रखते हैं, लेकिन अनुशासन और सीमाओं की कमी रह जाती है।

4. Uninvolved parenting style
Uninvolved parenting में माता-पिता बच्चो के जीवन में लगभग शामिल नहीं होते। वे बच्चों पर ध्यान नहीं देते हैं और बच्चे जो करना चाहे, करने देते हैं। माता-पिता अपने काम या नौकरी में इतने व्यस्त रहते हैं कि बच्चों के साथ समय बिताने का समय नहीं निकाल पाते।
इस स्टाइल में माता-पिता बच्चों की केवल जरूरते पूरी कर देते हैं, लेकिन इस बात पर ध्यान नहीं देते कि बच्चा क्या कर रहा है, क्या खा रहा है, कहाँ जा रहा है, उसकी सगंत कैसी है या पढ़ाई कैसी चल रही है। वे न तो बच्चों से उनकी परेशानियों के बारे में पूछते हैं और नहीं उनके साथ समय बिताते हैं। इस वजह से बच्चे भावनात्मक रूप से अकेला महसूस करने लगते हैं।
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1. पहले प्यार, फिर सुधार
जब बच्चा कोई गलती करे, तो सबसे पहले उसे डांटने या चिल्लाने की बजाय प्यार और शांति से समझाइए। बच्चे को उसकी गलती का एहसास करवाए और यह बताएं कि गलती करना गलत नहीं है, लेकिन उसे सुधारना जरूरी है।
इसके बाद उसे सही तरीका सिखाएं ताकि वह अगली बार वही गलती दोबारा ना दोहराए।
2. डराने की बजाय समझाएं
अगर बच्चा किसी गलत चीज की जीत कर रहा है, तो उसे डराने या धमकाने की बजाय शांति से समझाएं कि ऐसा करने के क्या नुकसान हो सकते हैं। जब बच्चा कारण समझता है, तो वह आपकी बात ज्यादा आसानी से मान लेता है। डर दिखाने से बच्चा बात समझने की बजाय आपसे डरने लगता है और मन मे दूरी बनाने लगता है।
3. बच्चों को जैसा है, वैसा स्वीकार करें
हर बच्चा अलग होता है। माता-पिता को बच्चों को दूसरों से तुलना करने या अपनी उम्मीदों के हिसाब से ढालने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। बच्चे की रुचि और क्षमता को समझ कर उसी दिशा में उसे आगे बढ़ने में मदद करें। बार-बार नकारात्मक शब्द कहने से बच्चे का आत्मविश्वास टूटता है, इसलिए उसे स्वीकार करें, समझे और उसका हौसला बढ़ाएं।
4. बच्चों को छोटी-छोटी गलतियां करने दे
बच्चों को हर बात पर डांटने या रोकने की जरूरत नहीं होती। उन्हें छोटी-छोटी गलतियां करने दे, ताकि वे उनसे सीख सके। इससे बच्चे में सीखने की आदत और आगे चलकर गलतियों को संभालने की क्षमता विकसित होती है। जरूरी है कि गलती पर उसे समझाया जाए, लेकिन इतना भी नहीं कि कुछ नया करने से डरने लगे।
5. बच्चों को अपनी छोटी-छोटी समस्याएँ खुद सुलझाने दे
अक्सर माता-पिता बच्चों की छोटी-छोटी समस्या खुद ही हल करने लगते हैं, जिससे बच्चे दूसरों पर निर्भर हो जाते हैं। बच्चों को उनकी उम्र के अनुसार खुद होमवर्क करने, खुद खाने या कपड़े पहनने जैसे काम करने दे। इससे उनमें सोचने, समझने और समस्या सुलझाने की क्षमता विकसित होती है और वे आत्मनिर्भर बनते हैं।

सबसे अच्छी पेरेंटिंग कौन सी होती है। Which Parenting Style is best
Authoritative parenting सबसे अच्छी मानी जाती है। इस स्टाइल में माता-पिता बच्चों के साथ होते हैं, उन्हें अकेला महसूस नहीं होने देते और मजबूत, भरोसे वाले संबंध बनाते हैं। वे बच्चों की देखभाल करते हैं, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा या चिल्लाने से बचते है और बच्चों के आत्मविश्वास को बढ़ाते हैं।
Authoritative parenting में संतुलन होता है – ना बहुत सख़्ती ना पूरी आज़ादी – जिससे बच्चे सुरक्षित, समझदार और खुश रहते है और महसूस करते हैं कि उनके माता-पिता हमेशा उनके साथ है
अपने बच्चे की दूसरों से तुलना करना क्यों बुरा है?
बच्चों की दूसरों से तुलना करना बहुत हानिकारक होता है। इससे उनका आत्मविश्वास गिरता है और उन्हें लगता है कि वह कभी भी अच्छा नहीं कर सकते। लगातार तुलना से बच्चे खुद को कमतर समझने लगते हैं, अपनी पहचान बनाने में देर होती है और वे हमेशा दूसरों के मुकाबले खुद को कम आंकने लगते हैं।
यदि माता-पिता ही बच्चे को पूरी तरह समझ नहीं पाते, तो बच्चा यह सोचने लगता है कि कोई भी उसे नहीं समझेगा। इससे उसका मानसिक संतुलन प्रभावित हो सकता है और भविष्य में वह कमजोर या असुरक्षित महसूस कर सकता है। इसलिए बच्चों की तुलना करना उनकी परवरिश के लिए बिल्कुल सही नहीं है।
खराब पोषण बच्चो को कैसे प्रभावित करता हैं?
अगर बच्चों का पालन पोषण सही तरीके से नहीं किया जाता, तो उनका व्यवहार और सोचने-समझने का तरीका प्रभावित होता है। ऐसे बच्चे गलत रास्ते अपनाने लगते हैं और छोटी-छोटी गलतियों से बड़े नुकसान उठा सकते हैं। खराब पालन पोषण के कारण वे असुरक्षित और अनुशासनहीन व्यवहार करने लगते हैं, जैसे ड्रग्स लेना, स्मोकिंग, शराब का सेवन, गुस्सा करना, बदतमीजी करना या अपनी मनमानी करना।
इस स्थिति में बच्चों में अनुशासन और सम्मान की कमी पैदा होती है। वह न केवल दूसरों का सम्मान करना भूल जाते हैं, बल्कि माता-पिता का सम्मान भी कम कर देते हैं। सही और सकारात्मक पालन पोषण ही बच्चों को संतुलित, समझदार और जिम्मेदार बनाता है।
माता-पिता के झगड़े से बच्चे कैसे प्रभावित होते हैं?
अगर माता-पिता बच्चों के सामने झगड़ते हैं, चिल्लाते हैं या गाली-गलोज करते हैं, तो बच्चे यह व्यवहार देखकर सीख लेते हैं। बड़े होकर ऐसे बच्चे गुस्सा जल्दी दिखाने, झगड़ालू और अनुशासनहीन बनने लगते हैं।
इससे उनकी मानसिक स्थिति पर नकारात्मक असर पड़ता है और उन्हें यह आदत लग जाती है कि चिल्लाना या गाली-गलोज करना सामान्य है। बच्चों के भावनात्मक और सामाजिक विकास के लिए जरूरी है कि माता-पिता अपने विवादों को उनके सामने ना दिखाएं।

निष्कर्ष
असल में कोई भी पेरेंटिंग बिल्कुल परफेक्ट नहीं होती। जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, उनकी ज़रूरतें बदलती रहती है और माता-पिता भी सिखते रहते हैं। सबसे जरूरी यह है कि आप अपने बच्चों को अनुशासन और प्यार के साथ बड़ा करें और उन्हें अच्छे संस्कार दे।
पेरेेंटिंग क्या है, इसे समझने का मतलब सिर्फ नियम बनाना या सख़्ती दिखाना नहीं है। इसका असली मतलब है बच्चों के साथ अच्छा रिश्ता बनाना, उन्हें सही और गलत समझाना और खुद उदाहरण पेश करना। यदि आप बच्चों को ईमानदारी, अच्छी आदतें और सही आचरण सिखाना चाहते हैं, तो सबसे पहले आप वही व्यवहार अपनाए। बच्चे वही सिखते हैं जो वे अपने माता-पिता में देखते हैं।
FAQ:
प्रश्न 1. बच्चों की सबसे कठिन उम्र क्या होती है?
उत्तर. बच्चों की सबसे कठिन उम्र आमतौर पर 13 से 18 साल के बीच मानी जाती है। इस समय उनका मानसिक और शारीरिक विकास तेज़ी से हो रहा होता है। शरीर में हार्मोनल बदलाव होते हैं और उनके सामने कई नई चुनौतियाँ आती हैं। इसी वजह से इस उम्र में बच्चे भावनात्मक रूप से ज़्यादा संवेदनशील हो जाते हैं।
प्रश्न 2. जिद्दी बच्चे को कैसे वश में करें?
उत्तर. जब बच्चा जिद करे, तो उसे मारना या डांटना सही तरीका नहीं है—इससे बच्चा और ज्यादा जिद्दी हो जाता है। उसकी बात को शांति से सुनें और प्यार से समझाएं कि उसकी जिद के नकारात्मक परिणाम क्या हो सकते हैं। जिस चीज की वह गलत जिद कर रहा है, वह तुरंत देने के बजाय उसके लिए कोई सही और अच्छा विकल्प दें। जब बच्चा शांत और खुश मूड में हो (जैसे सुबह या खेलते समय), तब उससे अच्छे से बात करें और सही व्यवहार सिखाएं। इससे बच्चा धीरे-धीरे जिद करना कम करता है और बात समझने लगता है।
हमें विश्वास है कि इस आर्टिकल के माध्यम से आपने समझा होगा कि पेरेंटिंग क्या है और पेंटिंग की स्टाइल क्या है, धन्यवाद।